उत्तराखंड की ग्लेशियर झीलें भी हो सकती हैं टाइम बम
नेपाल में ग्लेशियर झील फटने से मची तबाही ने उत्तराखंड के लिए भी खतरे की घंटी बजा दी है। उत्तराखंड की कई ग्लेशियर झीलें भी किसी टाइम बम से कम नहीं हैं। अगर समय रहते इनकी निगरानी और सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम नहीं किए गए, तो नेपाल जैसी आपदा का खतरा उत्तराखंड में भी पैदा हो सकता है। डॉ. विनीत गहलोत निदेशक हिमालयन वाडिया इंस्टीट्यूट का कहना है कि उत्तराखंड में करीब 426 ग्लेशियर झीलें मौजूद हैं, जिनमें से NDMA ने 13 झीलों को खतरनाक श्रेणी में चिन्हित किया है। इन झीलों पर अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाने के लिए केंद्र सरकार ने करीब 30 करोड़ रुपये मंजूर किए थे, जबकि 8.10 करोड़ रुपये जारी भी किए जा चुके हैं। इसके बावजूद कई कारणों से इन झीलों पर अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाने का काम अब तक शुरू नहीं हो पाया है। इनमें वसुंधरा ताल, माबांग, स्यूंतियांक्ति और प्युंगरु जैसी झीलें शामिल हैं। इन झीलों की लगातार निगरानी के लिए आधुनिक उपकरण और बेहतर कम्युनिकेशन सिस्टम लगाए जाने हैं, लेकिन उपकरणों की उपलब्धता और संचार व्यवस्था की कमी अभी भी बड़ी चुनौती बनी हुई है।
